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शालाओं में पढ़ाई कम, दिखावा ज्यादा
आज स्कूलों में
शिक्षा कम होती है,
और उत्सव और दिखावा ज्यादा।
आज कोई भी
किसी दिन का समारोह मनाता है,
कल किसी और दिन का,
और परसों फिर कोई सप्ताह।
हर हफ्ते
एक नया बोर्ड,
एक नया बैनर,
एक नया कार्यक्रम।
📸 फोटो लिए जाते हैं,
🤳 सेल्फी खींची जाती है,
और सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी जाती है।
फिर लोग कहते हैं —
“हमारे स्कूल में बहुत एक्टिविटी है।”
🔎 निरीक्षण (Inspection) के लिए ही पढ़ाई
जब निरीक्षक आता है —
-
कक्षा सजाई जाती है
-
कॉपियाँ देखी जाती हैं
-
फाइलें चेक की जाती हैं
और निरीक्षक के जाने के बाद —
पढ़ाई फिर वैसे ही
फाइलों में दबी रहती है।
लेकिन बच्चों के मामले में —
-
पढ़ाई कमजोर है
-
लेखन कमजोर है
-
सोच भी उलझी हुई है
लेकिन फोटो
परफेक्ट होते हैं।
📖 पढ़ाई कहाँ खो गयी?
दिन मनाते-मनाते —
-
पढ़ाई गायब हो गयी
-
लेखन गायब हो गया
-
मूलभूत शिक्षा गुम हो गयी
लेकिन —
“कार्यक्रम सफल रहा”
ऐसा रिपोर्ट बनाया जाता है।
शिक्षा कोई
कार्यक्रम नहीं है,
ये तो एक रोज़ की मेहनत है।
❓ सवाल कौन पूछे?
आज बच्चे —
कह सकते हैं कि
आज कौन सा दिन है,
लेकिन —
कोई एक पन्ना ध्यान से पढ़ नहीं सकता।
बोर्ड से पाठ याद कर लेते हैं,
लेकिन विचार नहीं कर पाते।
क्यों?
क्योंकि स्कूल आज
पढ़ाने की जगह नहीं,
बल्कि दिखावा करने की जगह बन गया है।
✍️ कड़वा, पर सच्चा
स्कूलों में —
दिन मनाये गए,
हफ्ते मनाये गए,
और साल भी मनाये गए।
लेकिन —
क्या बच्चे बने?
ये सवाल
कोई पूछने वाला नहीं है।
क्योंकि —
फोटो अच्छे आए हैं,
सेल्फी शानदार हैं,
और दिखावा चल रहा है।
✍️ – Farukh Kelgave

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